पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने जमीन अधिग्रहण से जुड़े मुआवजा विवाद के मामले में नेशनल हाईवे अथॉरिटी ऑफ इंडिया (NHAI) की याचिका खारिज कर दी। अदालत ने यह फैसला जस्टिस जसगुरप्रीत सिंह पुरी की पीठ में सुनाया। कोर्ट ने कहा कि आर्बिट्रेशन की प्रक्रिया में आमतौर पर अदालत बीच में दखल नहीं देती। साथ ही एनएचएआई पर एक लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया गया। याचिकाकर्ता नेशनल हाईवे अथॉरिटी ऑफ इंडिया की ओर से वकील कंवलवीर सिंह कंग पेश हुए। वहीं दूसरे पक्ष के वकील मनदीप नागपाल वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग (VC) के माध्यम से पेश हुए। राज्य सरकार की ओर से पंजाब के सरकारी वकील (Addl. A.G.) सोमेश अरोड़ा ने पक्ष रखा। जानिए क्या था पूरा मामला नेशनल हाईवे अथॉरिटी ऑफ इंडिया ने साल 2020 में राष्ट्रीय राजमार्ग को चौड़ा करने के लिए आसपास के कुछ गांवों की जमीन अधिग्रहित की थी। सड़क को फोर और सिक्स लेन बनाने के लिए यह जमीन ली गई थी। जमीन अधिग्रहण की प्रक्रिया पूरी होने के बाद 27 सितंबर 2021 को संबंधित अधिकारियों ने जमीन मालिकों के लिए मुआवजे की राशि तय करते हुए अवॉर्ड जारी किया। हालांकि कई जमीन मालिकों को लगा कि उनकी जमीन की कीमत के मुकाबले उन्हें कम मुआवजा दिया गया है। इसी कारण उन्होंने इस फैसले को चुनौती देने का निर्णय लिया। इसके बाद जमीन मालिकों ने कानून के अनुसार अपना मामला डिविजनल कमिश्नर, पटियाला के पास रखा, जो इस तरह के मामलों में आर्बिट्रेटर के रूप में सुनवाई करते हैं। अब इस विवाद में मुआवजे की राशि को लेकर आर्बिट्रेशन प्रक्रिया के तहत सुनवाई चल रही है। NHAI ने आर्बिट्रेटर के आदेश को दी चुनौती सुनवाई के दौरान जमीन मालिकों ने अपने बयान हलफनामे के रूप में अदालत में जमा कराए। इसके बाद नेशनल हाईवे अथॉरिटी ऑफ इंडिया (NHAI) ने मांग की कि उन्हें इन गवाहों से जिरह (क्रॉस एग्जामिनेशन) करने का मौका दिया जाए, ताकि मुआवजे से जुड़े दावों की सही जांच की जा सके। हालांकि, मामले की सुनवाई कर रहे आर्बिट्रेटर ने 19 फरवरी 2026 को NHAI की यह मांग खारिज कर दी। आर्बिट्रेटर का कहना था कि उपलब्ध रिकॉर्ड और हलफनामों के आधार पर ही मामले की सुनवाई आगे बढ़ाई जाएगी। इसके बाद अंतिम बहस की प्रक्रिया शुरू कर दी गई। इस फैसले से असंतुष्ट NHAI ने आर्बिट्रेटर के आदेश को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर दी। याचिका में मांग की गई कि आर्बिट्रेटर के आदेश को रद्द किया जाए और उन्हें गवाहों से जिरह करने की अनुमति दी जाए, ताकि मामले की पूरी सच्चाई सामने आ सके। फैसले के समय हाईकोर्ट में याचिका दायर हाईकोर्ट के जस्टिस जसगुरप्रीत सिंह पुरी ने अपने आदेश में कहा कि आर्बिट्रेशन की प्रक्रिया के दौरान अदालत आमतौर पर बीच में दखल नहीं देती। अदालत ने बताया कि इस मामले में आर्बिट्रेटर के सामने सुनवाई लगभग पूरी हो चुकी थी और फैसला सुनाया जाना बाकी था। कोर्ट ने यह भी कहा कि मामले में पहले से ही तय था कि 28 फरवरी 2026 तक फैसला सुनाया जाना है। ऐसे में जब सुनवाई अपने अंतिम चरण में थी, उसी समय नेशनल हाईवे अथॉरिटी ऑफ इंडिया (NHAI) की ओर से हाईकोर्ट में याचिका दायर कर दी गई। अदालत के अनुसार रिकॉर्ड से यह भी सामने आया कि सुनवाई के दौरान NHAI की तरफ से कई बार तारीखें ली गईं। इसके बाद जब फैसला आने वाला था, तब याचिका दाखिल की गई, जिससे आर्बिट्रेशन की प्रक्रिया रुक सकती थी और मामले के निपटारे में और देरी हो सकती थी। इसलिए अदालत ने इस दखल को उचित नहीं माना। रेवेन्यू रिकवरी की तरह वसूला जा सकता है इन सभी तथ्यों को देखते हुए पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने नेशनल हाईवे अथॉरिटी ऑफ इंडिया (NHAI) की याचिका को खारिज कर दिया। अदालत ने माना कि इस तरह की याचिका से चल रही आर्बिट्रेशन प्रक्रिया पर अनावश्यक असर पड़ सकता था और मामले के अंतिम फैसले में देरी हो सकती थी। कोर्ट ने यह भी कहा कि अदालत का समय बेवजह लेने और प्रक्रिया को लंबा करने जैसी स्थिति से बचना जरूरी है। इसी कारण हाईकोर्ट ने NHAI पर एक लाख रुपये का जुर्माना लगाया। अदालत ने आदेश दिया कि यह राशि दो महीने के भीतर हाईकोर्ट लीगल सर्विसेज कमेटी के पास जमा करानी होगी। साथ ही यह भी स्पष्ट किया गया कि अगर तय समय में यह रकम जमा नहीं कराई जाती है तो इसे सरकारी बकाया (रेवेन्यू रिकवरी) की तरह वसूला जा सकता है।