पंजाब के बेअदबी कानून को चुनौती देने वाली याचिका पर बुधवार को पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट में सुनवाई हुई। इस दौरान कोर्ट ने साफ किया कि वह पहले यह तय करेगा कि याचिका सुनवाई के लायक है या नहीं, उसके बाद ही कानून की संवैधानिक वैधता पर विचार होगा। सुनवाई के दौरान पंजाब सरकार ने याचिकाकर्ता की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल उठाए। सरकार ने कहा कि याचिकाकर्ता ने अपने खिलाफ दर्ज पुराने मामलों, एफआईआर, बार काउंसिल विवाद, लाइसेंस निलंबन और जुर्माने जैसी महत्वपूर्ण जानकारियां छिपाई हैं। ऐसे में यह जनहित याचिका न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग हो सकती है।वहीं, याचिकाकर्ता ने दलील दी कि राज्य सरकार ने 2008 के कानून में संशोधन कर बेअदबी से जुड़े मामलों में सजा बहुत ज्यादा कठोर कर दी है। उन्होंने कहा कि पहले से ही भारतीय कानूनों में धार्मिक भावनाएं आहत करने और पूजा स्थलों के अपमान के लिए प्रावधान मौजूद हैं। याचिकाकर्ता ने यह भी तर्क दिया कि आपराधिक कानून समवर्ती सूची का विषय है, इसलिए अगर राज्य का कानून केंद्र के कानून से टकराता है तो राष्ट्रपति की मंजूरी जरूरी होती है। बिना मंजूरी यह कानून अमान्य हो सकता है। आम परिस्थितियों में भी सख्त सजा का खतरा इसके अलावा, याचिका में कहा गया कि नए कानून में कुछ मामलों में 5 साल तक की सजा, बेअदबी पर 7 से 20 साल तक की कैद और साजिश के मामलों में उम्रकैद तक का प्रावधान है, जो बहुत कठोर है। साथ ही, कुछ धाराओं में आपराधिक मंशा (मेंस रिया) स्पष्ट नहीं है, जिससे आम परिस्थितियों में भी सख्त सजा का खतरा हो सकता है। अगले सप्ताह भी होगी सुनवाई कोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद कहा कि पहले यह देखा जाएगा कि याचिका सही तरीके से दाखिल की गई है या नहीं। साथ ही, सरकार द्वारा दिए गए अतिरिक्त दस्तावेज याचिकाकर्ता को उपलब्ध कराने के निर्देश दिए गए हैं। मामले की अगली सुनवाई अगले सप्ताह होगी, जिसमें सिर्फ याचिका की मेंटेनबिलिटी पर फैसला किया जाएगा।