हरियाणा के ब्यूरोक्रेट्स को SOP बनाने के निर्देश:बैंक घोटालों के बाद सरकार अलर्ट; लिखित में मांगेंगे सिफारिश, बिना वेरिफिकेशन नहीं लेंगे गिफ्ट

हरियाणा को हिला देने वाले करीब 590 करोड़ रुपए के आईडीएफसी बैंक घोटाले के बाद राज्य सरकार ने प्रशासनिक तंत्र को सतर्क करते हुए वरिष्ठ IAS अधिकारियों को निजी व्यक्तियों से संपर्क और व्यवहार को लेकर खुद की मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) तैयार करने के निर्देश दिए हैं। मुख्य सचिव अनुराग रस्तोगी ने हाल ही में एक हाई लेवल मीटिंग के विचार-विमर्श सेशन में प्रशासनिक सचिव स्तर के अधिकारियों को इस मामले के तौर-तरीकों को अभूतपूर्व बताते हुए कहा कि भविष्य में ऐसी घटनाओं से बचने के लिए व्यक्तिगत और प्रशासनिक स्तर पर सुरक्षा प्रोटोकॉल जरूरी हैं। सूत्रों के अनुसार, यह कदम केवल एक घोटाले की प्रतिक्रिया नहीं है, बल्कि नौकरशाही के कामकाज के तरीके में व्यवहारिक सतर्कता लाने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है। क्यों जरूरत पड़ी IAS अधिकारियों के लिए SOP? 1. घोटाले का तरीका असामान्य था आरोपी निजी व्यक्तियों ने कथित तौर पर अधिकारियों से नजदीकी दिखाकर प्रभाव बनाया। फोन कॉल, सिफारिश और सामाजिक संपर्क का इस्तेमाल कर भरोसा हासिल किया गया। इससे उन्होंने अपना प्रभाव अन्य कर्मचारियों को दिखाया और गलत काम करवाए। इस वजह से वह इस बैंक घोटाले की शुरुआत कर पाए। 2. अधिकारियों के नाम आने से जांच का दायरा बढ़ा हरियाणा के इन बैंक घोटालों में कई अफसरों के नाम सामने आए हैं। यही वजह है कि सरकार ने इस मामले में दो आईएएस अफसरों को सस्पेंड किया है। इसके अलावा 10 से अधिक आईएएस ऑफिसर की संलिप्तता मिली है। हालांकि अब इस मामले की जांच केंद्रीय जांच एजेंसी सीबीआई को चली गई है। स्टेट विजिलेंस ने भी सभी दस्तावेज सीबीआई को सौंप दिए हैं। 3. सिस्टम में “प्रोटोकॉल गैप” सामने आया अब तक की हुई जांच में कई ऐसे तथ्य सामने आए हैं जिनमें ब्यूरोक्रेसी के इस पूरे सिस्टम में प्रोटोकॉल गैप भी दिखाई दिया है। जैसे इस मामले में जो भी अफसर संलिप्त रहे हैं उन्होंने निजी व्यक्तियों से मुलाकात, फोटो, निमंत्रण और सिफारिशों को लेकर स्पष्ट दिशा-निर्देशों का कोई ध्यान नहीं रखा, जिसके बाद ऐसे हालात बन गए कि इस पूरे घटनाक्रम में अफसरों की घोर लापरवाही सामने आई। IAS अधिकारियों के लिए प्रस्तावित SOP: क्या करना है (Do’s) IAS अधिकारियों के लिए SOP: क्या नहीं करना है (Don’ts) क्या हैं व्यावहारिक चुनौतियां? हर विभाग में निजी संपर्क जरूरी होते हैं: उद्योग, राजस्व, शहरी विकास जैसे विभागों में नागरिकों से लगातार संपर्क होता है। ऐसे में “दूरी बनाए रखना” व्यवहारिक रूप से कठिन है। वरिष्ठ अधिकारियों की सिफारिश को नजरअंदाज करना मुश्किल: प्रशासनिक संस्कृति में वरिष्ठों की बात को टालना जोखिम भरा माना जाता है। केवल नाम आने पर कार्रवाई से मनोबल पर असर: अधिकारियों का तर्क है कि आरोपी किसी का भी नाम ले सकता है, इसलिए बिना ठोस साक्ष्य कार्रवाई से निर्णय लेने की क्षमता प्रभावित हो सकती है। आगे क्या असर पड़ सकता है? प्रशासनिक मामलों के जानकार राजेश कुमार ने बताया कि प्रशासनिक निर्णय लेने में अधिक सावधानी बरतनी होगी। फाइलों की जांच और सत्यापन प्रक्रिया लंबी हो सकती है। अधिकारियों से मिलने और सिफारिश कराने की प्रक्रिया ज्यादा औपचारिक हो जाएगी। हर संपर्क और निर्णय का रिकॉर्ड रखने पर जोर रहेगा। अगर यह SOP प्रभावी रहती है, तो अन्य राज्य भी इसी तरह के प्रोटोकॉल लागू कर सकते हैं। इन 2 बैंक घोटालों के बाद अलर्ट हुई सरकार

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