पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट में 17 साल पुराने जमीन विवाद से जुड़े मामले में एक कानूनी सवाल उठा है। हाईकोर्ट ने पूछा है कि क्या राज्य मानवाधिकार आयोग के पास सीधे एफआईआर दर्ज कराने का अधिकार है। कोर्ट ने इस मामले में पंजाब राज्य मानवाधिकार आयोग से जवाब मांगा है। मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश शील नागू और न्यायमूर्ति संजीव बेरी की खंडपीठ ने की। कोर्ट ने आयोग के वकील को जवाब दाखिल करने के निर्देश देते हुए अगली सुनवाई 14 मई तय की है। 2007 में हुआ था जमीन का सौदा याचिका के अनुसार विवाद की शुरुआत अप्रैल 2007 में हुई थी। उस समय याचिकाकर्ता ने लुधियाना में तीन एकड़ से ज्यादा जमीन बेचने का समझौता किया था। इस सौदे के लिए एक करोड़ रुपए बतौर बयाना भी दिए गए थे। हालांकि बाद में पता चला कि जमीन से जुड़ा मामला पहले से ही सुप्रीम कोर्ट में लंबित था। याचिकाकर्ता का कहना है कि बाद में मूल खरीदार पीछे हट गया, जिसके बाद एक कंपनी के साथ नया समझौता किया गया। कंपनी ने नहीं पूरा किया सौदा याचिका में कहा गया है कि सुप्रीम कोर्ट से फैसला आने के बाद भी कंपनी ने जमीन का सौदा पूरा नहीं किया। इसके बाद समझौता रद्द कर दिया गया। बाद में कंपनी ने सिविल कोर्ट में स्पेशल परफॉर्मेंस का केस दायर कर दिया। याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया कि वर्ष 2016 में एक तीसरे व्यक्ति ने कंपनी के साथ मिलकर उसी जमीन को लेकर अलग समझौता कर लिया। पुलिस बोली आयोग ने दिए FIR के आदेश याचिकाकर्ता के मुताबिक लुधियाना पुलिस ने जांच के बाद मामला दर्ज करने से इनकार कर दिया था। इसके बावजूद 24 दिसंबर 2024 को दिल्ली में एफआईआर दर्ज हुई। इसके बाद पंजाब राज्य मानवाधिकार आयोग ने 10 मार्च 2026 को एफआईआर दर्ज करने के निर्देश जारी कर दिए। इसी आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई है। अब हाईकोर्ट के सामने सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या मानवाधिकार आयोग सीधे एफआईआर दर्ज कराने का आदेश दे सकता है या नहीं। अदालत इस मामले में आयोग की संवैधानिक और कानूनी शक्तियों पर विस्तार से विचार करेगी।