हरियाणा सरकार के भारी-भरकम फंड को निजी बैंकों में नियमों को ताक पर रखकर ट्रांसफर करने के मामले में केंद्रीय जांच एजेंसी (CBI) ने अपनी जांच की रफ्तार दोगुनी कर दी है। सूत्रों के मुताबिक, इस घोटाले की आंच हरियाणा के शीर्ष प्रशासनिक अधिकारियों तक पहुंच चुकी है और आने वाले दिन सूबे की नौकरशाही के लिए बड़े झटके वाले हो सकते हैं। CBI के उच्च पदस्थ सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, जांच एजेंसी हरियाणा कैडर के एक वरिष्ठ IAS अधिकारी को गिरफ्तार करने की पुख्ता तैयारी में है। इस अधिकारी पर पद का दुरुपयोग करते हुए सरकारी खजाने के ₹590 करोड़ की रकम को तय दिशा-निर्देशों का उल्लंघन कर IDFC और एयू स्मॉल फाइनेंस बैंक में जमा कराने (फिक्स्ड डिपॉजिट/खातों में) का मुख्य आरोप है। एजेंसी ने अधिकारी के खिलाफ पर्याप्त दस्तावेजी सबूत जुटा लिए हैं और गिरफ्तारी के लिए कानूनी प्रक्रिया और उच्च स्तरीय मंजूरी की औपचारिकताएं पूरी की जा रही हैं। दो सीनियर अफसरों से पूछताछ इस घोटाले की कड़ियों को जोड़ने के लिए CBI की एक विशेष टीम ने हरियाणा के दो अन्य वरिष्ठ अधिकारियों से कड़ाई से पूछताछ पूरी कर ली है। सूत्रों का कहना है कि यह पूछताछ चार चार घंटे तक चली, जिसमें सरकारी फंड को प्राइवेट बैंकों में शिफ्ट करने के पीछे के ‘आकाओं’ और इसके बदले मिले ‘कमीशन/किकबैक’ को लेकर सवाल दागे गए। इन दोनों अफसरों की भूमिका इस पूरे ट्रांजैक्शन को प्रोसेस करने और फाइलों को क्लियर करने में संदिग्ध मानी जा रही है। जब्त फोन के डेटा से खुले गहरे राज इस केस में सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट तब आया जब CBI ने पिछले दिनों संदिग्ध अधिकारियों के डिजिटल डिवाइसेज को अपने कब्जे में लिया था। जब्त किए गए मोबाइल फोनों के डिलीट डेटा, व्हाट्सएप चैट्स, और एन्क्रिप्टेड कॉल्स के बैकअप से कई चौंकाने वाले और पुख्ता साक्ष्य (डिजिटल एवीडेंस) मिले हैं। डेटा एनालिसिस में ये बातें सामने आई हैं चैट से साफ हुआ है कि सरकारी फंड को इन विशेष बैंकों में रखने के लिए मोटी डील हुई थी। फोन डेटा से यह भी सुराग मिले हैं कि घोटाले की रकम का एक हिस्सा बेनामी संपत्तियों या हवाला के जरिए कहां-कहां ठिकाने लगाया गया। क्या है पूरा ₹590 करोड़ का घोटाला? यह मामला सरकारी नियमों को ताक पर रखकर जनता के पैसे को निजी फायदों के लिए इस्तेमाल करने का है। नियमानुसार, किसी भी सरकारी विभाग या बोर्ड/निगम का पैसा राष्ट्रीयकृत बैंकों में ही रखा जाना चाहिए, या फिर इसके लिए सख्त टेंडर प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिए।