मानसून का ‘रौद्र रूप’: 23 दिन सूखा, 7 दिनों में फूट रहा ‘रेन बम’

बिहार में मानसून अब अपने पुराने और सुहावने ढर्रे को छोड़ चुका है। मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार, मानसून अब एक ‘विनाशकारी स्प्रिंटर’ की तरह आता है और कुछ ही घंटों में तबाही मचाकर निकल जाता है। इस बड़े बदलाव को ‘कंप्रेस्ड वेदर पैटर्न’ नाम दिया गया है। इसका सीधा मतलब है कि जो बारिश पहले पूरे एक महीने के दौरान आराम से होती थी, वह अब 5 से 7 दिनों में सिमट गई है। मौसम वैज्ञानिकों का कहना है कि बिहार का मानसून अब धीरे-धीरे और सुहावना होकर नहीं बरसता, बल्कि एक ‘विनाशकारी स्प्रिंटर’ की तरह आता है और कुछ ही घंटों में तबाही मचाकर निकल जाता है। मौसम विज्ञान विभाग और विशेषज्ञों ने पुष्टि की है कि बिहार में अब कंप्रेस्ड वेदर पैटर्न प्रभावी हो गया है। सीधा मतलब है कि मानसून के चार महीनों में होने वाली कुल बारिश अब चंद दिनों और घंटों में सिमट गई है। यह बदलाव केवल मौसम की एक घटना नहीं है, बल्कि यह बिहार की अर्थव्यवस्था, शहरी ढांचे और आम आदमी की सुरक्षा पर बड़ा प्रहार है। खेती पर संकट व क्यों बढ़ी तबाही धान की रोपनी: जून-जुलाई में बारिश न होने से धान व रोपनी 20-25 दिन पिछड़ रही है। इससे खेती का पूरा फसल चक्र व कैलेंडर खराब हो गया है। फसल की बर्बादी: फसल पकने के समय सितंबर में ‘क्लाउड बर्स्ट’ जैसी बारिश होती है। तेज हवाओं के कारण फसलें खेतों में बिछ जाती हैं और अनाज सड़ जाता है। उपजाऊ मिट्टी बहना: कम समय में अचानक बहुत ज्यादा पानी बरसने से खेतों की ऊपरी उपजाऊ परत बह जाती है। इससे खेतों की पैदावार की क्षमता लगातार घट रही है। वज्रपात का कहर: अधिक तापमान और अचानक नमी से सघन क्युमुलोनिम्बस बादल बनते हैं। इससे बिजली गिरती है। ज्यादा मौतें वज्रपात से हो रही हैं। शहरों का डूबना: शहरों के ड्रेनेज 24 घंटे में 20-30 मिमी पानी निकालते हैं। लेकिन अब 3 घंटे में 100 मिमी बारिश होने से पॉश इलाके डूब जाते हैं। आंकड़ों का विश्लेषण: मानसून का टाइम-टेबल कैसे बिगड़ा? पैरामीटर पारंपरिक पैटर्न (1990-2010) नया कंप्रेस्ड पैटर्न (2020-2026) औसत रेनी डेज 55 से 60 दिन 35 से 40 दिन जून की बारिश समय पर, पर्याप्त (163 मिमी) 40-50% की भारी कमी सितंबर की बारिश विदाई के साथ हल्की (209 मिमी) 20-30% की बढ़ोतरी (अतिवृष्टि) बारिश का स्वभाव रिमझिम और लंबी अवधि अचानक, तीव्र और जानलेवा बदलनी होगी हमारी विकास की रणनीति पटना विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति व भूगोलविद् प्रो. आरबी सिंह के अनुसार, हमें ‘स्पंज सिटी’ और वाटर हार्वेस्टिंग पर जोर देना होगा। किसानों को अब 110-120 दिनों में तैयार होने वाली ‘शुष्क सम्राट’ जैसी धान की किस्में लगानी होंगी। बिहार की प्राचीन ‘अहर-पाइन’ प्रणाली को भी पुनर्जीवित करना होगा। बंगाल की खाड़ी का तापमान बना कारण पटना मौसम विज्ञान केंद्र के मौसम वैज्ञानिक आशीष कुमार के अनुसार, ग्लोबल वार्मिंग के कारण बंगाल की खाड़ी का तापमान बढ़ गया है। कम दबाव के क्षेत्र अब बिहार के ऊपर आकर स्थिर हो जाते हैं। अधिक ऊर्जा व नमी जमा होने से बादल एक ही जगह पर सारा पानी ‘डंप’ कर देते हैं, जिसे ‘रेन बम’ की स्थिति कहते हैं। क्यों बेकाबू हुआ मौसम और क्या है समाधान? ग्लोबल वार्मिंग से बिहार में ‘कंप्रेस्ड वेदर पैटर्न’ हावी, जून-जुलाई में सूखा और सितंबर में अतिवृष्टि से परेशानी

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