बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी की तस्वीर अलग चमक बिखेर रही है। माथे पर त्रिपुंड, भगवा गमछा और मंदिर-मंदिर दर्शन करते एक नेता, जो शपथ ग्रहण के महज 6 दिनों में 3 मंदिरों और 1 गुरुद्वारे में माथा टेक चुके हैं। वहीं जनता दरबार, एक बुजुर्ग मुस्लिम ने सम्मान पूर्वक टोपी पहनाने की कोशिश की, सम्राट ने विनम्रता से हाथ पकड़ लिया। टोपी ले ली, लेकिन सिर पर नहीं चढ़ाई। ये कोई छोटी घटना नहीं। ये प्रतीकात्मक राजनीति का बड़ा बदलाव है। सम्राट चौधरी मंदिर-मंदिर क्यों घूम रहे हैं। क्या ये सिर्फ आस्था है या फिर राजनीतिक संदेश। क्या वो संघ परिवार को बता रहे हैं कि अब बिहार में भी हिंदू संस्कृति और सनातनी पहचान बिना किसी झिझक के सामने आ सकती है। या फिर नीतीश कुमार की पुरानी ‘सभी को खुश रखने वाली सेकुलर’ वाली राजनीति से साफ तौर पर दूरी बना रहे हैं। इन्हीं सवालों का जवाब आज के एक्सप्लेनर बूझे की नाहीं में…। सवाल-1ः सम्राट चौधरी कब-कब मंदिर और गुरुद्वारा गए? जवाबः 15 अप्रैल को बिहार के 24वें मुख्यमंत्री बने सम्राट चौधरी लगातार मंदिर जाकर पूजा कर रहे हैं। बीते 6 दिनों में वह 3 मंदिर और 1 गुरुद्वारा जा चुके हैं। मुस्लिम टोपी पहनने से इनकार 17 अप्रैल को सम्राट चौधरी ने जनता दरबार लगाया। वहां उनसे मिलने एक बुजुर्ग मुस्लिम पहुंचे। उन्होंने सम्मान पूर्वक टोपी पहनाने की कोशिश की, लेकिन सम्राट ने विनम्रता से उनका हाथ पकड़ लिया। टोपी ले ली और सुरक्षा में तैनात जवान को दे दिया। सवाल-2ः मंदिर-मंदिर क्यों घूम रहे सम्राट चौधरी? जवाबः सम्राट चौधरी को RSS (राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ) की विचारधारा से आने वाला नेता नहीं माना जाता है। उनके मुख्यमंत्री बनने से पहले राजनीतिक जानकार और नेता RSS की पसंद-नापसंद को लेकर कई सवाल उठा रहे थे। सम्राट चौधरी ने मुख्यमंत्री बनने के बाद मंदिर-मंदिर घूमकर उन सभी लोगों को जवाब दिया है। पूजा-पाठ से पुराना नाता रखने वाले चौधरी अब मीडिया के सामने पूजा कर रहे हैं। ताकि लोगों के बीच बनी धारणा को तोड़ा जा सके। सम्राट के मंदिर-मंदिर घूमने के पीछे 3 बड़े मैसेज हैं… 1. ‘हिन्दुत्व’ कार्ड और कोर वोटर को संदेश अब तक सम्राट चौधरी की छवि प्रखर हिन्दू नेता की नहीं रही है। उनका राजनीतिक बैकग्राउंड समाजवादी रहा है। यही कारण है कि उनके मुख्यमंत्री बनने से पहले कई तरह के सवाल उठ रहे थे। अब जब वह मुख्यमंत्री बन गए हैं और उस पार्टी से मुख्यमंत्री बने हैं, जिनकी विचारधारा हिन्दुत्व की है तो उनको अपनी पहचान उसी रूप में बदलनी होगी। मंदिर-मंदिर घूमकर भाजपा के मुख्यमंत्री के रूप में सम्राट चौधरी अपनी छवि को एक प्रखर हिंदू नेता के रूप में स्थापित करना चाहते हैं। पद की शपथ लेने से ठीक पहले पंचमुखी हनुमान मंदिर जाना और फिर हरिहर नाथ मंदिर में विशेष पूजा करना, भाजपा के पारंपरिक ‘हिंदुत्व’ एजेंडे को धार देने की कोशिश है। सम्राट चौधरी इन दौरों से भाजपा के कोर वोट बैंक को यकीन दिला रहे हैं कि उनके शासन में ‘सनातन’ का सम्मान सर्वोच्च होगा। वे केवल नाम के लिए नहीं, बल्कि स्वभाव और संस्कार से भी उसी विचारधारा के वाहक हैं, जिसे भाजपा और उसका आधार वोटर चाहता है। 2. संघ परिवार को मैसेज- ‘हम आपसे अलग नहीं’ भाजपा में अक्सर चर्चा रहती है कि कौन सा नेता ‘कोर विचारधारा’ के कितना करीब है। सम्राट चौधरी का मंदिर जाना सीधे तौर पर RSS और उसके अलग-अलग संगठनों (VHP, बजरंग दल) को एक भरोसे का संदेश है। 3. ‘सेक्युलरिज्म का ढोंग नहीं चलेगा’ बिहार की राजनीति दशकों तक ‘सेक्युलरिज्म’ के इर्द-गिर्द घूमती रही है, जिसे भाजपा अक्सर ‘तुष्टिकरण’ कहती आई है। सम्राट चौधरी का यह आक्रामक धार्मिक रुख पुरानी परिपाटी को चुनौती देता है। सवाल-3ः क्या सम्राट बिहार के पहले मुख्यमंत्री हैं, जो मंदिर-मंदिर घूम रहे हैं? जवाबः बिल्कुल नहीं। नीतीश कुमार, राबड़ी देवी, लालू यादव सहित सभी मुख्यमंत्री अपने अपने कार्यकाल के दौरान मंदिर जाते रहे हैं। लेकिन सम्राट चौधरी की गतिविधि में बाकी नेताओं से फर्क है। सवाल-4ः क्या सम्राट PM मोदी के मॉडल को फॉलो कर रहे हैं? जवाबः लग तो ऐसा ही रहा है। PM नरेंद्र मोदी शपथ से पहले और बाद में मंदिरों का दौरा जरूर करते रहे हैं। वह समय-समय पर मंदिर में पूजा करने जाते रहे हैं और माथे पर त्रिपुंड लगाकर अपने धर्म का बेहिचक इजहार करते रहे हैं। जैसे… इसी तरह से देखें तो सम्राट चौधरी भी लगातार मंदिर पहुंच रहे हैं और अपने धर्म का खुलकर इजहार कर रहे हैं।