सम्राट चौधरी के रूप में BJP को बिहार में पहला CM मिला। बुधवार को उन्होंने शपथ ली। पार्टी दफ्तर में उनके लिए अभिनंदन कार्यक्रम किया गया। लेकिन, दोनों जगहों से BJP के कई बड़े नेता गायब रहे। इसके बाद इस बात की चर्चा तेज हो गई है कि क्या सम्राट चौधरी के CM बनने से पार्टी के भीतर गुटबाजी बढ़ गई है? क्या सम्राट के चयन से बीजेपी के नेताओं में नाराजगी है? इसके चार संकेत समझिए। आइए अब इसे विस्तार से समझते हैं…. BJP के कार्यकर्ता सम्राट चौधरी के CM बनने से नाराज हैं। इसकी शुरुआत उनके नाम का प्रस्ताव विधायक दल की बैठक में रखने वाले विजय सिन्हा के बयान से हुई। बैठक में विजय सिन्हा ने कहा, ’भाजपा का सिपाही होने के नाते अपने कमांडर के आदेश के अनुसार गठबंधन की राजनीति को लेकर चलने के लिए हमने सम्राट चौधरी जी का प्रस्ताव दिया।’ इनकी नाराजगी का आलम केवल बयान तक ही सीमित नहीं रहा। उन्होंने सम्राट चौधरी के शपथ ग्रहण कार्यक्रम से भी दूरी बनाई। न लोकभवन में आयोजित कार्यक्रम में गए और न BJP दफ्तर में आयोजित कार्यकर्ता सम्मान समारोह में। हालांकि शाम में सम्राट चौधरी के आवास पर जाकर विजय सिन्हा ने उन्हें बधाई दी। क्यों नाराज है BJP का एक धड़ा? नाराजगी की सबसे बड़ी जड़ सम्राट चौधरी की पृष्ठभूमि को बताया जा रहा है। पार्टी के एक वरिष्ठ नेता ने नाम न छापने की शर्त पर कहा, ‘हम बिहार में अपनी सरकार चाहते थे, लेकिन नेतृत्व उस व्यक्ति के हाथ में है, जिसकी रगों में भाजपा का मूल विचार नहीं है। सम्राट ने अपना राजनीतिक सफर राजद से शुरू किया, फिर जदयू में रहे और कुछ साल पहले ही भाजपा में आए। शपथ ग्रहण समारोह में न बड़े नेता आए और न किसी राज्य के CM सम्राट चौधरी के शपथ ग्रहण के लिए पूरी तैयारी की गई थी। BJP के भीतर एक परंपरा सी रही है कि अगर किसी राज्य में CM शपथ लेते हैं तो PM नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह समेत केंद्रीय स्तर के तमाम बड़े नेता शामिल होते हैं। बिहार में पहली बार जब BJP का कोई CM शपथ ले रहा था तब न ही कोई बड़े केंद्रीय नेता शामिल हुए और न ही किसी राज्य के CM आए। केंद्र के दूत बनकर केवल जेपी नड्डा और केंद्रीय पर्यवेक्षक के तौर पर शिवराज सिंह चौहान शामिल हुए। हैरानी तो इस बात की रही कि 5 महीने पहले नीतीश कुमार के NDA विधायक दल का नेता चुन लिए जाने और हाल में राज्यसभा चुनाव जीतने पर बधाई देने वाले PM नरेंद्र मोदी ने सोशल मीडिया पर सम्राट को शपथ लेने के लगभग 3 घंटे बाद बधाई दी। क्यों शामिल नहीं हुए बड़े नेता? दरअसल, BJP बिहार के इस पावर ट्रांसफर को स्मूद रखना चाहती थी। इसलिए सबकुछ सामान्य और सादगी से करने का प्रयास किया गया है। पार्टी ऐसा कोई मैसेज नहीं देना चाहती थी, जिससे लगे कि नीतीश कुमार को कुर्सी से हटाकर अपने नेता को बैठाया है। अभिनंदन समारोह से भी बड़े नेताओं ने बनाई दूरी पटना के वीरचंद पटेल पथ स्थित BJP स्टेट हेडक्वार्टर में पहली बार उस दफ्तर का कोई नेता CM बनकर पहुंचा था। पार्टी की तरफ से कार्यकर्ता सम्मेलन का आयोजन किया गया था। प्रदेश अध्यक्ष संजय सरावगी और नवनिर्वाचित राज्यसभा साांसद शिवेश राम को छोड़ दें तो कोई बड़े नेता मंच पर नहीं पहुंचे। पार्टी के कुछ पदाधिकारी जरूर थे, लेकिन सांसद, विधायक से लेकर पार्टी के बड़े चेहरे गायब रहे। क्यों शामिल नहीं हुए पार्टी के बड़े नेता? बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष के मुताबिक ये कार्यकर्ताओं की तरफ से सम्मान समारोह था, इसलिए इसमें केवल कार्यकर्ता थे, कोई पदाधिकारी नहीं। लेकिन, भीतरखाने मूल वजह मूल भाजपाई नेताओं की नाराजगी बताई जा रही है। बधाई के पोस्टर से भी बड़े नेताओं ने किया परहेज अक्सर पटना की सड़कों पर भाजपा के किसी भी छोटे-बड़े आयोजन पर बड़े-बड़े होर्डिंग्स और पोस्टरों की बाढ़ आ जाती है। हाल ही के कई मौकों पर ये दिखा भी। नितिन नवीन पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने या संजय सरावगी को प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया तो पटना के सभी वीवीआईपी इलाकों को पोस्टरों से पाट दिया गया। बुधवार का नजारा पूरी तरह बदला हुआ था। पटना के वीरचंद पटेल पथ (भाजपा मुख्यालय मार्ग) और राजभवन के पास गिने-चुने पोस्टर ही नजर आए। चौंकाने वाली बात यह रही कि पार्टी के किसी भी स्थापित बड़े नेता, चाहे वे संजय जायसवाल हों, मंगल पांडेय हों या मेनस्ट्रीम के किसी बड़े नेता ने सम्राट की ताजपोशी के स्वागत में बड़े पोस्टर नहीं लगवाए। सम्राट के कुछ प्रशंसक नेताओं ने कुछ इलाकों में पोस्टर जरूर लगवाए। वहीं, देर शाम तक राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) के नाम से कई इलाकों में सम्राट की तस्वीर वाले होर्टिंग और पोस्टर लगाए गए। पोस्टर से परहेज क्यों? भास्कर ने इस मामले पर कुछ बड़े नेताओं से बात की। इसपर वे बात करने से बचते रहे। उनका कहना था कि ये पार्टी का फैसला होता है। पार्टी की तरफ से पोस्टर और होर्डिंग लगाए जाते हैं। उनकी तरफ से इस तरह का कुछ नहीं किया जाता है। सोशल इंजीनियरिंग के साथ कोर वोट बैंक पर भी फोकस BJP इस बात को अच्छे से समझ रही है कि उनका कोर वोट बैंक बिहार में वैश्य और सवर्ण रहा है। इन्हें इनका वफादार वोट बैंक माना जाता रहा है। सम्राट चौधरी को मुख्यमंत्री बनाना इनकी ‘सोशल इंजीनियरिंग’ का हिस्सा है, जिसके जरिए वे कुशवाहा वोटों को साधने के साथ नीतीश कुमार के वोट बैंक को इंटैक्ट रखना चाहते हैं। इस चक्कर में पार्टी अपने वफादार वोट बैंक को नाराज करने का रिस्क नहीं उठाना चाहती है। हालांकि फिलहाल बिहार में कोई चुनाव नहीं है, लेकिन अगर उनका समीकरण बिगड़ता है तो 2029 के लोकसभा चुनाव में पार्टी को बड़ा नुकसान हो सकता है। यही कारण है कि टॉप लीडरशिप इसे ध्यान में रखते हुए फैसले ले रही है।