मां सुबह 6 बजे घर से निकली थी। हम 3 बहनें सो रहे थे। मां ने जगाकर कहा था बेटा खाना खा लेना। मैं शाम में आती हूं। दोपहर में खाना खाने से पहले फोन आया कि मां ने आत्महत्या कर ली है। मां की लाश फर्श पर थी। स्थानीय लोगों फोटो दिखाया था मां फंदे से लटकी है। पैर मोड़कर घुटने के बल बैठी हुई थी। FIR दर्ज कराने गए तो थानाध्यक्ष समरेंद्र कुमार ने कहा कि हम जैसा कहते हैं वैसा लिखो। ये बातें बेगूसराय के कस्तूरबा गांधी बालिका आवासीय विद्यालय की वार्डन रिंकू कुमारी की बेटी तेजस्विनी ने कही है। रिंकू की मौत का रहस्य 5 साल बाद भी नहीं सुलझा है। पटना हाईकोर्ट ने 8 तारीख की सुनवाई में स्थानीय पुलिस की जांच पर सवाल उठाए और केस की जांच नए सिरे से करने के आदेश दिए हैं। अब जांच शुरुआत से होगी। इसके लिए आईजी विकास वैभव को जिम्मा सौंपा गया है। हाईकोर्ट ने माना कि बेगूसराय पुलिस के निचले स्तर के अधिकारी इस मामले में न्याय नहीं कर सकते। विकास वैभव को कोर्ट ने उन्हें खुली छूट दी है कि वे अपनी टीम खुद चुनें और बेगूसराय पुलिस को सख्त निर्देश दिया है कि वे विकास वैभव की टीम को हर संभव सहयोग दें। परिजन बोल रहे हत्या, पुलिस की थ्योरी आत्महत्या 4 अप्रैल 2021 की सुबह रिंकू कुमारी अपने घर असुरारी से स्कूल के लिए निकली थी। दोपहर करीब 2 बजे उनकी बेटी तेजस्विनी को उनकी मौत की सूचना मिली। जब परिजन स्कूल पहुंचे, तो रिंकू कुमारी का शव फर्श पर पड़ा था। पुलिस और स्थानीय लोगों ने उन्हें मोबाइल में तस्वीरें दिखाई, जिनमें शव पंखे से लटका हुआ था, लेकिन शरीर धूल और मिट्टी से सना था, पैर जमीन को छू रहे थे। परिजनों ने इसे हत्या बताया, जबकि पुलिस आत्महत्या का रूप देने में जुटी रही।
बेटी का आरोप- दबाव में बदली गई FIR याचिकाकर्ता बेटी तेजस्विनी कुमारी ने कोर्ट को बताया कि मैं प्राथमिकी दर्ज कराने वीरपुर थाना पहुंची तो तत्कालीन थाना प्रभारी ने संदिग्धों कौशल कुमार और रोहित कुमार के खिलाफ नामजद FIR दर्ज करने से मना कर दिया। पुलिस ने अपनी मर्जी से आवेदन लिखवाया और उस पर मेरे हस्ताक्षर लिए। तेजस्विनी का कहना है कि आरोपी मेरे पड़ोसी हैं और उन्होंने मेरी मां से जमीन के एवज में 15 लाख रुपए लिए थे। मौत से पहले लिखा था 2 पेज का लेटर रिंकू ने मौत से पहले 2 पेज का एक लेटर लिखा था। कौशल के नाम से लिखे गए इस लेटर में उसने कहा था कि किस तरीके से 15 लाख रुपए का जुगाड़ करके दिया था। किस-किस से कैसे पैसे लिए थे और अब पैसा लौटाना कितनी मजबूरी है। कौशल ने 4 अप्रैल 2021 को ही पैसे लौटाने का वादा किया गया था, लेकिन उसी दिन रिंकू की संदिग्ध मौत हो गई। कोर्ट ने पाया कि स्थानीय पुलिस की जांच में कई बड़े झोल थे, जिन्हें नजरअंदाज किया गया।
साढ़े पांच घंटे बंद क्यों रहा CCTV जस्टिस संदीप कुमार ने अपने आदेश में पुलिस की जांच को पूरी तरह से एकतरफा और संदिग्ध बताया। घटना के दिन स्कूल के सीसीटीवी कैमरे सुबह 7:57 बजे बंद हो गए और ठीक दोपहर 1:45 बजे (जब शव बरामद हुआ) फिर से चालू हो गए। पुलिस ने कभी यह नहीं पूछा कि साढ़े पांच घंटे कैमरे बंद क्यों थे, क्या कोई साक्ष्य मिटाया जा रहा था।
पुलिस ने केस बंद करने की जल्दबाजी दिखाई रिंकू कुमारी का शव पार्शियल हैंगिंग (अर्ध-लटकती हुई स्थिति) में था, जहां उनके मुड़े पैर जमीन को छू रहे थे। मेडिकल विशेषज्ञों और हाईकोर्ट ने माना कि ऐसी स्थिति में हत्या की संभावना ज्यादा होती है, लेकिन पुलिस ने इसे आत्महत्या मानकर केस बंद करने की जल्दबाजी दिखाई। तत्कालीन थाना प्रभारी ने उसके बताए गए आरोपियों के खिलाफ केस दर्ज करने के बजाए, अपनी मर्जी से आवेदन लिखवाया और उस पर जबरन हस्ताक्षर कराए। पटना हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि निष्पक्ष जांच हर नागरिक का मौलिक अधिकार है। कोर्ट ने कहा कि जब स्थानीय पुलिस की जांच किसी विशेष दिशा में मोड़ दी गई हो या प्रभाव में हो, तो संवैधानिक अदालतों का यह कर्तव्य है कि वे दोबारा जांच के आदेश दें।
रुपए न लौटाने पड़े, इसलिए की हत्या याचिकाकर्ता तेजस्विनी के अनुसार यह कोई साधारण आत्महत्या नहीं बल्कि सुनियोजित हत्या थी। आरोपियों ने रिंकू कुमारी से जमीन दिलाने के नाम पर 15 लाख रुपये लिए थे। 4 अप्रैल 2021 को ही इन पैसों को वापस करने के लिए पंचायत बुलाई गई थी। आरोप है कि पैसे नहीं लौटाने पड़ें, इसलिए वार्डन की हत्या कर दी गई और उसे सुसाइड का रूप देने के लिए स्कूल प्रशासन के साथ मिलकर साजिश रची गई।
पुलिस की पुरानी थ्योरी जांच का आधार नहीं केस की जांच अब शून्य से होगी। यानी डी नोवो जांच की होगी। अब विकास वैभव और उनकी टीम पुरानी चार्जशीट या पुलिस की पुरानी थ्योरी को आधार नहीं बनाएगी। वे नए सिरे से चश्मदीदों के बयान लेंगे, फॉरेंसिक साक्ष्यों की दोबारा जांच करेंगे और उन कड़ियों को जोड़ेंगे, जिन्हें वीरपुर थाना की पुलिस ने जानबूझकर छोड़ दिया था। यह जांच अब शुरू से होगी, जिसमें पुराने सबूतों और बयानों पर निर्भर रहने के बजाय नए सिरे से सत्य की खोज की जाएगी।
पुलिस अधिकारियों के लिए चेतावनी है आदेश इस आदेश के बाद मृतका की बेटी तेजस्विनी को न्याय की एक नई उम्मीद जागी है। पांच साल इंतजार और सिस्टम से लड़ने के बाद अब उम्मीद है कि इस रहस्यमयी मौत का सच सामने आएगा। यह मामला केवल एक हत्या या आत्महत्या का नहीं, बल्कि पुलिस की कार्यशैली पर सवाल है। कैसे एक संवेदनशील मामले में साक्ष्यों को नजर अंदाज किया गया। कोर्ट का यह आदेश उन पुलिस अधिकारियों के लिए एक चेतावनी है जो जांच में कोताही बरतते हैं। पिछले साल डिस्टिक कोर्ट ने केस बंद कर दिया था मृतका की बेटी ने कहा कि हम नाम दे रहे थे, लेकिन उसने नाम नहीं दिया, सही तरीके से इन्वेस्टिगेशन नहीं किया। कोर्ट में नालिसी दायर किया तो ट्रायल शुरू हुआ, 9 अप्रैल 2025 को केस डिस्टिक कोर्ट ने क्लोज कर दिया। पुलिस ने क्लोजर रिपोर्ट में आत्महत्या साबित किया था। इस बीच में हम लोग मानवाधिकार चले गए थे। डिस्ट्रिक्ट कोर्ट में केस क्लोज होने पर पटना हाई कोर्ट के वकील आकांक्षा मालवीय ने काफी सपोर्ट किया और मेरी तरफ से कोर्ट में सभी साक्ष्य प्रस्तुत किए। लगता है कि मेरी मां की मौत का राज खुल जाएगा। पुलिस अगर उसी समय सही से जांच करती तो न्याय मिल जाता। हम लगातार गुहार लगाते रहे थे कि अच्छे से जांच की जाए, लेकिन कोई देखने के लिए तैयार नहीं हुआ। एसपी, डीएम, डीआईजी, डीजीपी सबको आवेदन भेजें। रामकृष्ण ने कहा- वर्दी बिकी या ईमान समाजिक कार्यकर्ता रामकृष्ण के अनुसार कहते हैं पुलिस मददगार होती है, लेकिन बेगूसराय में पुलिस सौदागर बन गई। कस्तूरबा गांधी आवासीय विद्यालय की वार्डन रिंकू कुमारी की मौत महज एक हादसा या आत्महत्या नहीं थी, बल्कि यह हत्या थी उस भरोसे की जो एक आम नागरिक खाकी पर करता है। 15 लाख का जमीनी विवाद, कॉल रिकॉर्ड्स के सबूत और एक बेटी के आंसू, स्थानीय पुलिस को नहीं दिखा। पड़ोसियों ने जमीन के नाम पर मेहनत की गाढ़ी कमाई के 15 लाख डकार लिए। न जमीन दी, न पैसा लौटाया। जब समाज जागा, पंचायती बैठी और पैसा लौटाने का डेडलाइन आया, तो उन दरिंदों ने पैसा लौटाने के बजाय मौत का सामान तैयार कर लिया। जिस दिन पैसा मिलना था, उसी दिन कस्तूरबा गांधी आवासीय विद्यालय के भीतर रिंकू कुमारी की लाश मिली। स्कूल का परिसर बेटियों की सुरक्षा का मंदिर होना चाहिए था, वहां एक मां की हत्या कर उसे आत्महत्या का रूप दे दिया गया। 40 पेज का आदेश कड़वे सच पर मुहर रामकृष्ण कहते हैं बेगूसराय पुलिस ने वह किया जो अपराधियों ने चाहा। चश्मदीदों को अनसुना किया, पंचायती के फैसलों को फाइलों से गायब कर दिया और बिना किसी ठोस जांच के क्लोजर रिपोर्ट अदालत में पटक दी। पटना हाई कोर्ट के जस्टिस संदीप कुमार की 40 पन्नों की बेबाक टिप्पणियों ने उस कड़़वे सच पर मुहर लगा दी, जिसे पुलिस आत्महत्या की फाइलों में दबा चुकी थी। जस्टिस संदीप कुमार की बेंच ने जब इस ढुलमुल जांच की धज्जियां उड़ाई, तो साफ हो गया कि बेगूसराय पुलिस ने अपनी जांच की डायरी नहीं, बल्कि अपना जमीर बेचा था। पोस्टमार्टम रिपोर्ट को नजरअंदाज करना और साक्ष्यों को मिटाना क्या यही है सुशासन की पुलिसिंग।