‘जब नीतीश कुमार ने कमान छोड़ने का फैसला किया, तो उन्होंने खुद तय किया कि सम्राट चौधरी उनके उत्तराधिकारी होंगे। वह सिर्फ भाजपा की पसंद नहीं थे, बल्कि उन्हें खुद नीतीश कुमार ने आशीर्वाद दिया था।’ 16 मई को JDU के सीनियर लीडर और केंद्रीय मंत्री ललन सिंह ने लखीसराय में यह बातें कहीं। उनके इस बयान के बाद बिहार की राजनीति में अंदरखाने गहमागहमी है। ललन सिंह ने यह बयान क्यों दिया। JDU पर क्या असर पड़ेगा। सम्राट चौधरी को फायदा या नुकसान। जानेंगे, आज के एक्सप्लेनर बूझे की नाहीं में…। ललन सिंह ने सम्राट को नीतीश का उत्तराधिकारी क्यों बताया? सियासी गलियारे की चर्चा की मानें तो 3 बड़े कारण हैं… 1. JDU कार्यकर्ताओं को भरोसा कि आपकी भागीदारी बनी रहेगी अभी सत्ता की कमान भाजपा के सम्राट चौधरी के हाथों में है। ललन सिंह अपने बयान से ये बताना चाहते हैं कि सरकार का मूल विजन आज भी नीतीश कुमार का ही है और आगे भी रहेगा। 2. लव-कुश वोट बैंक को एकजुट रखना 3. भाजपा पर प्रेशर, सम्राट की पोजिशन मजबूत इस बयान के जरिए JDU यह मैसेज दे रही है कि सम्राट चौधरी सिर्फ भाजपा आलाकमान के फैसले से मुख्यमंत्री नहीं बने हैं, बल्कि इसके पीछे नीतीश कुमार की मर्जी और सहमति सबसे बड़ा कारण थी। पॉलिटिकल एनालिस्ट के मुताबिक, बार-बार नीतीश कुमार की कृपा का बखान कर JDU आम लोगों में यह धारणा बनाना चाहती है कि बिहार में नीतीश हैं, तभी भाजपा की यह स्थिति है। इससे मुख्यमंत्री पद मिलने के बाद भी भाजपा पूरी तरह से क्रेडिट अकेले नहीं ले पाएगी। सियासी गलियारे में चर्चा है कि सम्राट चौधरी के मुख्यमंत्री बनने के बाद बिहार भाजपा के भीतर अंदरखाने खींचतान थी। लेकिन… इतिहास के नजरिए से देखें तो जब भी कोई स्थापित और बड़ी राजनीतिक पार्टी ने अपने दल के किसी नेता के बजाय किसी दूसरी पार्टी के नेता को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया है, उसका आधार सिमटता गया है। …तो क्या इसे JDU का सरेंडर माना जाए? ललन सिंह का बयान भले ही आज NDA सरकार को स्थिरता दे रहा है, लेकिन भविष्य के पन्नों में इसे JDU के स्वतंत्र वजूद के सिमटने की आधिकारिक शुरुआत कही जाएगी। इसके 2 बड़े कारण… 1. कैडर और जमीनी कार्यकर्ताओं का मनोबल टूटेगा किसी भी राजनीतिक दल की रीढ़ उसके कार्यकर्ता होते हैं, जो इस उम्मीद में लाठियां खाते हैं और दरी बिछाते हैं कि एक दिन उनकी पार्टी का कोई नेता शीर्ष पर पहुंचेगा। उदाहरण…असम में असम गण परिषद (AGP) एक समय मजबूत क्षेत्रीय ताकत थी। लेकिन जब प्रफुल्ल कुमार महंत और पार्टी के शीर्ष नेतृत्व ने धीरे-धीरे अपनी जमीन भाजपा के अनुकूल छोड़नी शुरू की और खुद को उनके जूनियर पार्टनर के रूप में स्वीकार कर लिया, तो AGP का पूरा कैडर और जनाधार भाजपा में शिफ्ट हो गया। आज AGP असम में सिर्फ एक हाशिए की पार्टी बनकर रह गई है। 2. ‘वोट बैंक’ का दूसरी पार्टी में स्थायी ट्रांसफर जब एक बड़ा नेता किसी दूसरी पार्टी के नेता को अपना वारिस बताता है, तो वह अनजाने में अपने वोट बैंक को लाइसेंस दे देता है कि अब मेरे बाद आपको उसी के साथ जाना है। शुरुआती दौर में यह गठबंधन के लिए अच्छा दिखता है, लेकिन दीर्घकालिक रूप से मूल पार्टी का वोट बैंक पूरी तरह से दूसरी पार्टी का कोर वोटर बन जाता है। उदाहरण…बाल ठाकरे के समय शिवसेना महाराष्ट्र में बड़े भाई की भूमिका में थी और भाजपा जूनियर थी। लेकिन धीरे-धीरे वैचारिक समानता के कारण जब शिवसेना का वोट बैंक भाजपा को अपना स्वाभाविक नेता मानने लगा, तो 2014 आते-आते भाजपा बड़े भाई की भूमिका में आ गई। हालांकि, शिवसेना ने बाद में बगावत की, लेकिन तब तक उनका एक बड़ा धड़ा (एकनाथ शिंदे गुट) भाजपा के प्रभाव में जा चुका था। ऊपर की इन 2 थ्योरी के आधार पर JDU की स्थिति को देखें, तो ललन सिंह का बयान दोधारी तलवार है। ललन सिंह के बयान का सम्राट पर क्या असर? पॉलिटिकल एनालिस्ट के मुताबिक, ललन सिंह का यह बयान सम्राट चौधरी के लिए एक तरफ तो बड़ी राजनीतिक ढाल है, लेकिन दूसरी तरफ उनके लिए एक असहज करने वाली स्थिति भी है। आइए इन दोनों पहलुओं को समझते हैं… 1. सम्राट चौधरी के लिए कैसे ‘राहत’ 2. सम्राट चौधरी के लिए कैसे ‘मुसीबत’