चंडीगढ़ में केंद्र सरकार द्वारा नया किराया कानून लागू करने का मामला पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट पहुंच गया है। सोमवार को हुई सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने बड़ा सवाल उठाते हुए पूछा कि क्या तहसीलदार और अतिरिक्त उपायुक्त जैसे प्रशासनिक अधिकारियों को अदालत जैसी शक्तियां सौंपी जा सकती हैं। चीफ जस्टिस शील नागू की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने मामले की प्रारंभिक सुनवाई के बाद इसे रोस्टर के अनुसार उपयुक्त बेंच के पास भेजने के निर्देश दिए हैं। अब इस मामले पर मंगलवार को सुनवाई होने की संभावना है। दरअसल, केंद्र सरकार ने 6 मई को अधिसूचना जारी कर चंडीगढ़ में लंबे समय से लागू ईस्ट पंजाब अर्बन रेंट रेस्ट्रिक्शन एक्ट-1949 को हटाकर असम टेनेंसी एक्ट-2021 लागू कर दिया था। इस फैसले को हाईकोर्ट और डिस्ट्रिक्ट बार एसोसिएशनों ने चुनौती दी है। जानिए याचिकाकर्ता अदालत में क्या दलील दी याचिकाकर्ताओं ने अदालत में कहा कि नए कानून के तहत ‘रेंट अथॉरिटी’ की शक्तियां तहसीलदार जैसे राजस्व अधिकारियों को दे दी गई हैं, जबकि अपील सुनने का अधिकार डिप्टी कमिश्नर को सौंपा गया है। उनका कहना है कि किराया विवादों का निपटारा हमेशा न्यायिक अधिकारियों द्वारा किया जाता रहा है और प्रशासनिक अधिकारियों को ऐसी शक्तियां देना न्यायिक व्यवस्था की स्वतंत्रता पर असर डालता है। सुनवाई के दौरान अदालत को बताया गया कि सुप्रीम कोर्ट और संविधान पीठ के कई फैसलों में यह स्पष्ट किया जा चुका है कि न्यायिक प्रकृति के अधिकार केवल न्यायिक प्रशिक्षण रखने वाले स्वतंत्र अधिकारियों के पास होने चाहिए। ऐसे में कार्यपालिका के अधिकारियों को अदालत जैसी शक्तियां देना स्थापित संवैधानिक सिद्धांतों के खिलाफ है। याचिका में यह सवाल भी उठाया गया कि क्या केंद्र सरकार किसी दूसरे राज्य का कानून सीधे चंडीगढ़ पर लागू कर सकती है। याचिकाकर्ताओं ने कहा कि चंडीगढ़ की शहरी व्यवस्था, भवन संरचना और सामाजिक परिस्थितियां असम से पूरी तरह अलग हैं। ऐसे में बिना स्थानीय जरूरतों को समझे यह कानून लागू करना सही नहीं है। बार एसोसिएशनों ने नए कानून के व्यावहारिक पहलुओं पर भी चिंता जताई। अदालत को बताया गया कि मौजूदा ढांचे में न तो पर्याप्त न्यायिक आधारभूत सुविधाएं हैं और न ही पक्षकारों को अदालत जैसी सुरक्षा मिल पाएगी। याचिका के अनुसार नए कानून से किरायेदारों की सुरक्षा कमजोर पड़ सकती है। मकान मालिक आसान प्रक्रिया के जरिए बेदखली की कार्रवाई शुरू कर सकता है, जबकि विवाद लंबा चलने पर किरायेदार पर बढ़ते दंडात्मक किराए का बोझ भी डाला जा सकता है।