चंडीगढ़ में फर्जी वेंडर लाइसेंस रैकेट का पर्दाफाश:निगम कर्मचारी बन वसूले ₹5-6 हजार, कमिश्नर का SSP को फोन, DSP लेवल पर जांच शुरू

चंडीगढ़ में वेंडरों के साथ ठगी का बड़ा मामला सामने आया है। शहर में एक शातिर ठग नगर निगम का कर्मचारी बनकर फर्जी वेंडर लाइसेंस तैयार कर रहा था और इसके नाम पर हजारों रुपए की वसूली कर रहा था। मामले का खुलासा टाउन वेंडिंग कमेटी के मेंबर्स की शिकायत के बाद हुआ है। मामले का पता चलते ही नगर निगम कमिश्नर ने SSP कंवरदीप कौर को फोन किया और मामले में सख्त एक्शन लेने के लिए कहा। इसके बाद SSP ने कार्रवाई करते हुए DSP साउथ वेस्ट धीरज कुमार को आरोपी को पकड़ने की जिम्मेदारी सौंपी। वहीं पुलिस स्टेशन 39 प्रभारी इंस्पेक्टर राजीव कुमार ने कहा कि मामले की जांच की जा रही है। 4 दिन बीतने के बाद भी नहीं पकड़ पाई पुलिस आरोपी फर्जी वेंडर लाइसेंस बनाने के मामले में कार्रवाई के लिए चंडीगढ़ टाउन वेंडिंग कमेटी के मेंबर मुकेश गिरी और नवनीत चावला की ओर से SSP व थाना 39 पुलिस को शिकायत दिए हुए 4 दिन बीत चुके हैं, लेकिन अभी तक पुलिस आरोपी को नहीं पकड़ पाई है। पुलिस को शिकायतकर्ताओं की ओर से आरोपी द्वारा दिया गया फर्जी आईकार्ड, जिस पर उसकी फोटो भी लगी हुई है और अन्य दस्तावेज सबूत के तौर पर मिल चुके हैं। 5000 में हुआ आईकार्ड का सौदा जिस फर्जी इंस्पेक्टर पर आरोप लग रहे हैं, उसने मोहम्मद मुनव्वर हुसैन का एक फर्जी आई कार्ड बनाया था। मुनव्वर ने बताया कि आरोपी उसके पास सेक्टर-41 में आया था और उसने खुद को नगर निगम वेंडर सेल का इंस्पेक्टर बताया। उसने कहा कि वह उनका आई कार्ड बनवा देगा और इसके लिए 5,000 रुपए लगेंगे। मुनव्वर को जरूरत थी, इसलिए उसने हामी भर दी और उसी समय 500 रुपए नकद दे दिए, जबकि बाकी 4,500 रुपए बाद में देने थे। आई कार्ड मिलने के बाद जब उसने इसे किसी को दिखाया, तो पता चला कि यह फर्जी है। इसके बाद उसने बाकी पैसे नहीं दिए। 5-6 हजार लेकर बनाता था फर्जी लाइसेंस मुकेश गिरी ने बताया कि आरोपी पहले वेंडरों से संपर्क करता था और उनके लाइसेंस, चालान और केस से जुड़ी जानकारी बताकर भरोसा जीतता था। इसके बाद वह कहता था कि उनका लाइसेंस पेंडिंग है और 5 से 6 हजार रुपए देकर तुरंत बनवाया जा सकता है। क्यूआर कोड भेज ऑनलाइन पेमेंट करवाता था खुद को नगर निगम चंडीगढ़ का कर्मचारी बताकर वह वेंडरों से पैसे लेता और फिर उन्हें व्हाट्सएप पर फर्जी वेंडर आई कार्ड भेज देता था। ठगी का सिलसिला यहीं खत्म नहीं होता था। आरोपी हर महीने वेंडर फीस के नाम पर 1400 से 1450 रुपए तक वसूलता था। इसके लिए वह वेंडरों को क्यूआर कोड भेजकर ऑनलाइन पेमेंट करवाता था, ताकि उसकी पहचान छिपी रहे। आरोपी ने खुद का एक फर्जी आईडी कार्ड भी बना रखा था, जिस पर नाम हरजिंदर सिंह शिंदा, पिता का नाम सौदागर सिंह और पद इंस्पेक्टर, नगर निगम चंडीगढ़ लिखा हुआ था। हैरानी की बात यह है कि इस फर्जी आई कार्ड पर नगर निगम कमिश्नर के नकली हस्ताक्षर भी किए गए थे। वह यह आई कार्ड वेंडरों को व्हाट्सएप पर भेजता था, जिससे वे उसकी बातों पर भरोसा कर लेते थे। वेंडरों का डेटा लीक होने की आशंका इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल यह खड़ा हो रहा है कि आरोपी के पास वेंडरों की इतनी गोपनीय जानकारी आखिर आई कहां से। जांच में सामने आया है कि उसे न सिर्फ वेंडरों के नाम और लाइसेंस नंबर की जानकारी थी, बल्कि यह भी पता था कि किस वेंडर का चालान कटा हुआ है, किसका केस लंबित है और कौन अपना लाइसेंस रिन्यू करवाने की प्रक्रिया में है। कहीं न कहीं से वेंडरों का डेटा लीक हुआ इतनी सटीक जानकारी होने के कारण वेंडर आसानी से उसकी बातों पर भरोसा कर लेते थे। आरोपी पहले इन्हीं जानकारियों का हवाला देकर वेंडरों को विश्वास में लेता था और फिर उन्हें झांसे में लेकर पैसे वसूलता था। इससे यह आशंका जताई जा रही है कि कहीं न कहीं से वेंडरों का डेटा लीक हुआ है या किसी सिस्टम से जानकारी बाहर आई है। यह भी संभावना है कि आरोपी के पास अंदरूनी जानकारी पहुंच रही थी या किसी माध्यम से उसे यह डिटेल्स मिल रही थीं। अब इस एंगल से भी जांच की जा रही है कि डेटा लीक कैसे हुआ और इसमें कोई अंदरूनी व्यक्ति शामिल तो नहीं है। अगर ऐसा पाया जाता है, तो यह मामला और गंभीर हो सकता है। नगर निगम की कार्यप्रणाली पर उठे सवाल सूत्रों के अनुसार, इस फर्जी रैकेट का शिकार शहर के कई वेंडर हो चुके हैं और उनसे न सिर्फ एक बार में हजारों रुपए लिए गए, बल्कि हर महीने भी लगातार वसूली की जा रही थी। कई वेंडरों ने बिना जांच किए पैसे दे दिए, क्योंकि आरोपी के पास उनकी पूरी जानकारी थी और वह खुद को नगर निगम का कर्मचारी बताकर भरोसा जीत लेता था। बताया जा रहा है कि कुछ वेंडर लंबे समय से इस ठगी का शिकार होते रहे, लेकिन उन्हें बाद में पता चला कि उनके साथ धोखाधड़ी हुई है। इसके बावजूद यह रैकेट काफी समय तक चलता रहा और बड़ी संख्या में लोगों को निशाना बनाया गया। ऐसे में नगर निगम की कार्यप्रणाली पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं कि इतने बड़े स्तर पर फर्जी लाइसेंस बनाकर और खुलेआम वसूली करने के बावजूद समय रहते इसकी जानकारी क्यों नहीं मिल सकी

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