चंडीगढ़ से राजपुरा, पटियाला, संगरूर, मानसा और बठिंडा जाने वाले लोगों का सफर आने वाले समय में आसान हो जाएगा। क्योंकि केंद्र सरकार ने चंडीगढ़ से राजपुरा तक बनने वाले रेल ट्रैक के लिए भूमि अधिग्रहण का नोटिफिकेशन जारी कर दिया है। 18.11 किलोमीटर लंबी इस लाइन के लिए मोहाली और पटियाला जिले के कई गांव शामिल किए गए हैं। इस जमीन को लेकर अगर किसी को ऐतराज है तो वह 30 दिन के भीतर बनूड़ के एसडीएम को लिखित में आपत्ति दर्ज करवा सकता है। इसके बाद अधिकारी सुनवाई कर फैसला लेंगे। सरकार की कोशिश है कि इस प्रोजेक्ट को प्राथमिकता से पूरा कर लोगों को जल्द सुविधा दी जाए। इससे पंजाब का मालवा क्षेत्र चंडीगढ़ से सीधा जुड़ जाएगा। 443.29 करोड़ रुपये का बजट मंजूर इस ट्रैक की मांग करीब 50 साल से चल रही थी। मौजूदा सरकार में रवनीत सिंह बिट्टू के केंद्रीय राज्यमंत्री बनने के बाद इस पर तेजी से काम आगे बढ़ा और 23 सितंबर 2025 को इसे केंद्र सरकार की मंजूरी मिली। इसे 2025-26 के रेल बजट में भी शामिल किया गया है और प्रोजेक्ट के लिए कुल 443.29 करोड़ रुपये का बजट स्वीकृत किया गया है। यह नई रेल लाइन राजपुरा (न्यू सराय बंजारा स्टेशन के पास) से मोहाली तक बनेगी। यह 18.11 किलोमीटर लंबा ट्रैक होगा, जो चंडीगढ़ को सीधे पंजाब के मालवा क्षेत्र से जोड़ेगा। दो साल लग सकते हैं लाइन में जमीन अधिग्रहण का काम फिलहाल चल रहा है और इसमें करीब 1 साल लगने की उम्मीद है। इसके बाद निर्माण कार्य शुरू होगा, जिसमें ट्रैक बिछाने, पुल बनाने और सिग्नलिंग सिस्टम लगाने का काम शामिल है। पूरा प्रोजेक्ट तैयार होने में लगभग 2 से 3 साल का समय लगेगा। अगर सब कुछ योजना के मुताबिक रहा तो 2028-2029 तक इस रूट पर पहली ट्रेन चल सकती है। अभी राजपुरा के लिए सीधी लाइन नहीं वर्तमान में चंडीगढ़ से राजपुरा के लिए कोई सीधी ट्रेन सेवा नहीं है। इसलिए, यात्रियों को अंबाला कैंट जंक्शन होकर जाना पड़ता है, जिसमें ट्रेन बदलने और रुकावटों के कारण करीब 1 घंटा 20 मिनट से 1 घंटा 50 मिनट का समय लगता है और रेल मार्ग से दूरी लगभग 73 किलोमीटर है। वहीं सड़क मार्ग से यह दूरी करीब 42 से 45 किलोमीटर है और बस से सफर आमतौर पर 50 मिनट से 1 घंटे में पूरा हो जाता है, जो ट्रैफिक पर निर्भर करता है। नई रेल लाइन बनने के बाद यह सफर काफी आसान हो जाएगा और यात्रा समय घटकर लगभग 20 से 30 मिनट रह सकता है, जिससे चंडीगढ़ और राजपुरा के बीच सीधी और तेज रेल कनेक्टिविटी मिल जाएगी। 1960 से उठ रही थी प्रोजेक्ट की मांग इस प्रोजेक्ट की मांग 1960 के दशक से उठती रही है। 1976 में तत्कालीन सांसद नारायण चंद पराशर और रघुनंदन लाल भाटिया ने रेल बजट चर्चा के दौरान इस लिंक की जरूरत बताई थी। 1995 में तत्कालीन रेलमंत्री सीके जाफर शरीफ ने बताया था कि इसका सर्वे पूरा हो चुका है। 2017 में इसे सैद्धांतिक मंजूरी भी मिली, लेकिन बजट और जमीन अधिग्रहण की दिक्कतों के कारण काम आगे नहीं बढ़ सका। बाद में फंडिंग को लेकर भी विवाद रहा, क्योंकि रेल मंत्रालय ने कम ट्रैफिक का हवाला देकर पंजाब सरकार से जमीन की लागत में भागीदारी करने को कहा था, जिस पर लंबे समय तक सहमति नहीं बन पाई और प्रोजेक्ट अटका रहा।