पंजाब एग्रो इंडस्ट्रीज कॉरपोरेशन लिमिटेड के सेवानिवृत्त कर्मचारी को पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट से बड़ा झटका लगा है। कोर्ट ने लगभग नौ वर्ष बाद दायर उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें उन्होंने अपने जूनियर कर्मचारियों के बराबर तकनीकी सहायक (ग्रेड-1) पद पर पदोन्नति, वेतन निर्धारण, एरियर, ब्याज और संशोधित पेंशन लाभ की मांग की थी। जस्टिस हरप्रीत सिंह बराड़ ने फैसले में कहा कि संवैधानिक अधिकारों के संरक्षण के लिए कोर्ट तभी हस्तक्षेप करता है, जब याचिकाकर्ता समय रहते अपने अधिकारों के प्रति सजग रहे। वर्षों तक निष्क्रिय रहने वालों को असाधारण अधिकार क्षेत्र का लाभ नहीं दिया जा सकता। कर्मचारी ने पदोन्नति रोके जाने को गलत बताया : याची हरिचंद की तरफ से कोर्ट में तर्क दिया गया कि वर्ष 2014 में उनके खिलाफ दर्ज एफआईआर में न तो कोई आरोप तय हुआ और न ही विभागीय चार्जशीट जारी हुई। जांच के बाद पुलिस ने कैंसिलेशन रिपोर्ट भी दायर कर दी थी। इसके बावजूद लंबित आपराधिक मामले का हवाला देकर उनकी पदोन्नति और सेवा विस्तार रोक दिया गया, जो सुप्रीम कोर्ट फैसले के विपरीत है। उनका कहना था कि इस कारण उन्हें करियर उन्नति, वेतन वृद्धि और पेंशन संबंधी वैध लाभों से वंचित किया गया। 2017 में रिटायर हुए, 2026 में कोर्ट पहुंचे : सुनवाई के दौरान सामने आया कि हरिचंद 28 फरवरी 2017 को सेवानिवृत्त हुए थे। उन्होंने उसी वर्ष एक कानूनी नोटिस भी भेजा लेकिन उसके बाद करीब नौ वर्षों तक अदालत का दरवाजा नहीं खटखटाया। वर्ष 2026 में दोबारा नोटिस भेजने के बाद उन्होंने हाईकोर्ट में याचिका दायर की। अदालत ने इसी पहलू को मामले में निर्णायक माना। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के कई महत्वपूर्ण फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि बार बार अभ्यावेदन या नोटिस भेजने से मृत या पुराने विवाद पुनर्जीवित नहीं हो जाते। कोर्ट ने दो टूक कहा कि अनावश्यक देरी न्यायसंगत राहत को समाप्त कर देती है। अदालत ने माना कि याचिकाकर्ता यह बताने में विफल रहे कि आखिर इतने लंबे समय तक उन्होंने न्यायिक उपचार क्यों नहीं लिया। इसलिए केवल पुराने नोटिसों के आधार पर अब अदालत के अधिकार क्षेत्र का प्रयोग उचित नहीं है। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने याचिका खारिज कर दी।