रुचिर शर्मा का कॉलम:चीन के पास आज भी डॉलर के प्रभुत्व का कोई तोड़ नहीं है

पिछले सप्ताह हुई बीजिंग समिट ने एक बार फिर उस ‘साम्राज्यवादी सन्ध्यावेला’ की चर्चा को हवा दे दी, जिसके अनुसार अमेरिका कथित रूप से अपना महाशक्ति का ताज चीन को सौंपने जा रहा है। लेकिन इसके बावजूद एक क्षेत्र ऐसा है, जिसमें स्थिति बिल्कुल उलट है। यह है वित्तीय प्रतिस्पर्धा का क्षेत्र। इसमें चीन ठहराव का शिकार हो रहा है और अमेरिका बिना किसी विशेष प्रयास के भी प्रभुत्वशाली बना हुआ है। दुनिया की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के बीच वित्तीय शक्ति का अंतर इतिहास में कभी भी इतना व्यापक नहीं रहा ​था। यदि हम अमेरिका से लेकर ब्रिटेन, फ्रांस, नीदरलैंड्स और फिर 15वीं शताब्दी तक के साम्राज्यों की शृंखला को देखें, तो सामान्यतः उभरती हुई चैलेंजर-शक्ति सैन्य क्षमता से लेकर व्यापार तक व्यापक ताकत विकसित करती थी। चीन लगभग हर दृष्टि से उसी परंपरा का अनुसरण करता है, सिवाय वित्त के क्षेत्र में। अतीत और वर्तमान की प्रतिद्वंद्वी मुद्राओं के विपरीत चीन की करेंसी रेनमिन्बी को अभी तक अंतरराष्ट्रीय मुद्रा के रूप में बहुत कम स्वीकृति मिली है। सामान्यतः जब कोई साम्राज्य आर्थिक शक्ति अर्जित करता है, तो उसकी मुद्रा केंद्रीय बैंकों द्वारा रखे जाने वाले विदेशी मुद्रा भंडार में बढ़ती हिस्सेदारी हासिल करने लगती है। लेकिन वैश्विक जीडीपी में 17 प्रतिशत हिस्सेदारी होने के बावजूद केंद्रीय बैंक भंडार में चीन की हिस्सेदारी केवल 2 प्रतिशत है। इस प्रकार चीन अपने उदय के समान चरण पर मौजूद पूर्व महाशक्तियों की तुलना में लगभग 30 से 40 वर्ष पीछे चल रहा है। इसी तरह व्यापार के क्षेत्र में भी जब कोई उभरती हुई शक्ति अपनी पकड़ मजबूत करती है, तो दुनिया उसकी मुद्रा में अधिक भुगतान स्वीकार करने लगती है- भले ही उस लेन-देन में वह नई शक्ति प्रत्यक्ष रूप से शामिल न हो। इतिहास को देखें तो अपने चरम पर ब्रिटेन की वैश्विक व्यापार में हिस्सेदारी 40 प्रतिशत थी, लेकिन व्यापारिक भुगतानों में उसकी मुद्रा पाउंड-स्टर्लिंग की हिस्सेदारी 60 प्रतिशत तक पहुंच गई थी। इसके विपरीत, चीन की वैश्विक व्यापार में अग्रणी 15 प्रतिशत हिस्सेदारी है, लेकिन व्यापारिक बिलों में केवल 2 प्रतिशत का भुगतान ही रेनमिन्बी में होता है। फेडरल रिजर्व का एक सूचकांक यह दर्शाता है कि व्यापार, मुद्रा विनिमय, ऋण और अन्य बड़े लेन-देन में दुनिया प्रमुख मुद्राओं का कितना व्यापक उपयोग करती है। वर्ष 2000 से अब तक इस सूचकांक में रेनमिन्बी की हिस्सेदारी शून्य से बढ़कर मात्र 2.5 प्रतिशत तक ही पहुंच सकी है। और यह उस दौर में हो रहा है, जब दुनिया पहले से कहीं अधिक ‘फाइनेंशियलाइज्ड’ हो चुकी है। शेयर बाजार, बैंक ऋण और कर्ज के स्तर- सभी विश्व अर्थव्यवस्था के अनुपात में विस्फोटक ढंग से बढ़े हैं। पिछली आधी शताब्दी में वित्तीय परिसंपत्तियों का मूल्य चार गुना बढ़कर वैश्विक जीडीपी के 400 प्रतिशत से भी अधिक हो गया है। डॉलर की सर्वव्यापकता अमेरिका को कई स्तरों पर वैश्विक व्यवस्था को नियंत्रित करने की क्षमता देती है। डॉलर की ऊंची मांग अमेरिका की उधारी लागत को कम रखती है और उसे लगातार बड़े राजकोषीय तथा व्यापारिक घाटे चलाने की अनुमति देती है। किसी अन्य राष्ट्र को यह विशेषाधिकार या उससे मिलने वाला भू-राजनीतिक प्रभाव प्राप्त नहीं है। चूंकि डॉलर-प्रधान वित्तीय व्यवस्था पर अमेरिका का नियंत्रण है, इसलिए वह देशों की वित्तीय नेटवर्क तक पहुंच रोककर उन पर दबाव बना सकता है- और कई बार बना भी चुका है। जब तक चीन इस वित्तीय मारक क्षमता की बराबरी नहीं कर लेता, तब तक वह एक अधूरी महाशक्ति बना रहेगा। दशकों से उसने अपनी वित्तीय व्यवस्था को किसी भी अन्य प्रमुख राष्ट्र की तुलना में कहीं अधिक कड़े नियंत्रण में रखा है। खुले बाजार सामान्यतः विश्वास बढ़ाते हैं। अध्ययनों से पता चलता है कि नियंत्रणों में ढील देने से पूंजी के आउटफ्लो की तुलना में उसका इनफ्लो अधिक बढ़ सकता है, जिससे आर्थिक वृद्धि और शेयर बाजार रिटर्न दोनों को बल मिलता है। अगर चीन अधिक साहसिक वित्तीय उदारीकरण नहीं करता है, तो वह कभी भी इस क्षेत्र में अमेरिका के प्रभुत्व को चुनौती नहीं दे पाएगा और न ही अपनी महाशक्ति बनने की महत्वाकांक्षा को पूरी तरह साकार कर सकेगा। डॉलर की ऊंची मांग अमेरिका की उधारी लागत को कम रखती है और उसे लगातार बड़े राजकोषीय-व्यापारिक घाटे चलाने की अनुमति देती है। किसी अन्य देश को यह विशेषाधिकार या उससे मिलने वाला भू-राजनीतिक प्रभाव प्राप्त नहीं।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *