चंडीगढ़ के सबसे व्यस्त एंट्री प्वाइंट्स में शामिल ट्रिब्यून चौक पर प्रस्तावित फ्लाईओवर परियोजना करीब एक दशक बाद भी जमीन पर नहीं उतर पाई है। पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने फ्लाईओवर निर्माण के लिए पेड़ों की कटाई और छंटाई पर रोक लगा रखी है। प्रशासन ने भी फिलहाल सुप्रीम कोर्ट का रुख न करने का फैसला लिया है और अदालत के अंतिम फैसले का इंतजार किया जाएगा। पहले हाई कोर्ट की रोक के बाद प्रशासन इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चैलेंज करने की योजना बना रहा था, लेकिन इसे फिलहाल के लिए टाल दिया गया है ट्रैफिक जाम से राहत देने के उद्देश्य से तैयार किया गया यह प्रोजेक्ट अब कानूनी विवाद, पर्यावरण और बढ़ती लागत के कारण लटक गया है। 2016 में ट्रैफिक जाम के बाद बना था प्लान ट्रिब्यून चौक फ्लाईओवर परियोजना वर्ष 2016 में तैयार की गई थी। उस समय ट्रैफिक स्टडी में सामने आया था कि शहर में आने-जाने वाला बड़ा हिस्सा इसी चौक से गुजरता है। ट्रिब्यून चौक दिल्ली, जीरकपुर, पंचकूला और इंडस्ट्रियल एरिया से आने वाले ट्रैफिक का मुख्य जंक्शन है। रोजाना करीब 1.5 लाख वाहन यहां से गुजरते हैं, जिसके कारण पीक ऑवर्स में लंबा जाम लगना आम बात हो गई है। 5 लाख की आबादी के लिए बना था शहर प्रशासन का तर्क है कि चंडीगढ़ की मूल योजना करीब 5 लाख आबादी के हिसाब से तैयार की गई थी, लेकिन अब ट्राइसिटी क्षेत्र की आबादी 15 लाख से ज्यादा हो चुकी है। इसके चलते वाहनों का दबाव कई गुना बढ़ गया है। इसी को देखते हुए इंजीनियरों ने ग्रेड सेपरेशन मॉडल के तहत 1.6 किलोमीटर लंबे एलिवेटेड कॉरिडोर, रोटरी और अंडरपास सिस्टम की योजना तैयार की थी, ताकि ट्रैफिक बिना रुके गुजर सके। 2019 में मंजूरी मिली, लेकिन काम अटका रहा हालांकि परियोजना को औपचारिक मंजूरी 2019 में मिल गई थी, लेकिन इसके बाद लगातार कानूनी अड़चनें आती रहीं। पेड़ों की कटाई, पर्यावरण प्रभाव और हेरिटेज सिटी के स्वरूप को नुकसान पहुंचने के मुद्दे को लेकर कई याचिकाएं हाईकोर्ट में दायर हुईं। इसी वजह से पिछले 4 से 5 वर्षों में परियोजना आगे नहीं बढ़ सकी। हाल ही में हाईकोर्ट ने फिर से पेड़ों की कटाई पर रोक लगा दी, जिससे प्रोजेक्ट एक बार फिर रुक गया। अदालत में प्रशासन ने दलील दी कि 2019 से चल रही कानूनी प्रक्रिया के कारण शहर का विकास लगभग एक दशक पीछे चला गया है और लोगों को भारी असुविधा झेलनी पड़ रही है। 130 करोड़ से बढ़कर 247 करोड़ पहुंची लागत लगातार देरी का असर परियोजना की लागत पर भी पड़ा है। वर्ष 2016 में जब इस परियोजना की योजना बनी थी, तब इसकी अनुमानित लागत करीब 130 से 137 करोड़ रुपए थी। 2019 में मंजूरी के समय लागत बढ़कर 183.74 करोड़ रुपए हो गई। अब ताजा स्वीकृत लागत 247.07 करोड़ रुपए तक पहुंच चुकी है।