मुख्यमंत्री ने बिहार से बाहर रह रहे लोगों से अपील की है कि वे वापस बिहार आएं और यहां उद्योग-धंधे स्थापित कर इसे समृद्ध बनाने में अपनी अहम भूमिका निभाएं। CM सम्राट चौधरी का यह बयान सुनने में काफी सुकून देता है। लेकिन सवाल उठना लाजिमी है कि सम्राट चौधरी ने ऐसा क्यों कहा और अगर सब लोग लौटेंगे तो सबसे बड़ी चुनौतियां क्या हैं। जानेंगे, आज के एक्सप्लेनर बूझे की नाही में…। मुख्यमंत्री क्यों बिहारियों को वापस बुला रहे, 3 बड़ी वजहें मुख्यमंत्री की इस अपील के पीछे 3 ठोस आर्थिक और रणनीतिक कारण हैं… 1. रिवर्स माइग्रेशन का आर्थिक लाभ उठाना चाहते हैं बिहार का बड़ा टैलेंट (कुशल श्रमिक, इंजीनियर और बिजनेसमैन) इस समय गुजरात, महाराष्ट्र, दिल्ली और कर्नाटक के औद्योगिक विकास की रीढ़ बना हुआ है। 2. 5 लाख करोड़ रुपए के निवेश का टारगेट सरकार ने राज्य में कानून-व्यवस्था के साथ-साथ सुशासन को मजबूत कर 5 लाख करोड़ रुपए के निवेश का रोडमैप तैयार किया है। 34 दिन की सरकार में सम्राट चौधरी का यह भरोसा हाल के कुछ फैसलों पर टिका है। 3. नई औद्योगिक नीति में बिजनेसमैन को कई ऑफर बिहार सरकार ने निवेशकों को आकर्षित करने के लिए कई कड़े और आकर्षक कदम उठाए हैं। जैसे… अगर बिहारी लौटे तो सम्राट क्या करेंगे, 4 बड़ी चुनौतियां मुख्यमंत्री का विजन जितना बड़ा है, जमीन पर चुनौतियां उतनी ही बड़ी है। अगर बिहारी लौटते हैं तो सरकार के सामने 4 बड़ी चुनौतियां होंगी… चुनौती-1: ढाई करोड़ प्रवसी कामगारों को कैसे देंगे रोजगार यह भारत में UP के बाद दूसरा सबसे ज्यादा आंकड़ा है। ये वर्कर मुख्य रूप से असंगठित क्षेत्र (निर्माण, फैक्ट्री, ट्रांसपोर्ट आदि) में काम करते हैं। चुनौती-2: इंडस्ट्री के लिए जमीन कहां से मिलेगी इंडस्ट्री लगाने के लिए सैकड़ों एकड़ बिना विवाद की जमीन की आवश्यकता होती है। बिहार में जमीन के छोटे-छोटे टुकड़े हैं और भूमि विवाद बहुत अधिक हैं। आंकड़ों से समझिए… चुनौती-3: पूंजी की कमी, बैंक सपोर्ट नहीं करते किसी भी नए उद्योग को शुरू करने के लिए बैंकों से लोन मिलना सबसे जरूरी होता है। बिहार का क्रेडिट-डिपॉजिट (CD) रेशियो राष्ट्रीय औसत (लगभग 75-80%) से कम (लगभग 60%) है। इसका मतलब है कि बिहार के लोग बैंकों में पैसा जमा तो खूब करते हैं, लेकिन बैंक यहां के लोगों को बिजनेस के लिए लोन देने में कतराते हैं। हालांकि, इस साल आंकड़े में सुधार हुआ है… सबसे बड़ी चुनौती है कि जब तक बैंकिंग सेक्टर स्थानीय उद्यमियों को आसानी से लोन नहीं देगा, तब तक छोटे और मझोले उद्योग (MSMEs) पनप नहीं पाएंगे। चुनौती-4: कानून-व्यवस्था और परसेप्शन की लड़ाई अतीत के ‘जंगलराज’ (1990 के दशक) की यादें और पुरानी छवि आज भी राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय निवेशकों के दिमाग में बाधा खड़ी करती हैं। फैक्ट्री लगाने के दौरान स्थानीय स्तर पर कुछ असामाजिक तत्वों द्वारा ठेकेदारी, लेबर सप्लाई या सीधे तौर पर रंगदारी मांगने की घटनाएं निवेशकों को डराती रही हैं। सबसे बड़ा सवाल- क्या सरकार सभी को रोजगार दे सकती है? नहीं, कोई भी सरकार सीधे तौर पर पूरी आबादी को सरकारी या सीधी नौकरी नहीं दे सकती। बिहार सरकार का लक्ष्य ‘सरकारी नौकरी’ देने से ज्यादा ‘रोजगार के अवसर उपलब्ध करना है। सरकार की रणनीति को इस तरह समझा जा सकता है…