हिमाचल प्रदेश में आगामी पंचायत चुनावों से पहले जमीन पर अवैध कब्जे और चुनाव लड़ने की पात्रता को लेकर कानूनी विवाद गहरा गया है। राज्य निर्वाचन आयोग के एक नए फरमान ने उन संभावित उम्मीदवारों की चिंता बढ़ा दी है, जिन पर सरकारी जमीन पर अतिक्रमण के आरोप हैं। इस बीच, किसान सभा बैजनाथ ने इस मुद्दे पर मोर्चा खोल दिया है। उन्होंने उपायुक्त कांगड़ा को एक ज्ञापन सौंपकर वन अधिकार कानून (FRA) के तहत लंबित दावों वाले ग्रामीणों को राहत देने की मांग की है। पंचायती राज अधिनियम के तहत जारी हुआ आदेश यह मामला हिमाचल प्रदेश पंचायती राज अधिनियम 1994 की धारा 122 (1)(c) से संबंधित है। हाल ही में हिमाचल हाईकोर्ट ने ‘गुरदेव बनाम हिमाचल राज्य’ मामले में स्पष्ट किया था कि यदि किसी व्यक्ति या उसके परिवार ने सरकारी, पंचायत या सहकारी भूमि पर कब्जा किया है, तो वह चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य माना जाएगा। इसी हाईकोर्ट के आदेश का हवाला देते हुए, राज्य निर्वाचन आयोग ने 8 दिसंबर 2025 को सभी जिला निर्वाचन अधिकारियों को निर्देश जारी किए हैं। इन निर्देशों में कहा गया है कि जिन लोगों ने अतिक्रमण के नियमितीकरण के लिए आवेदन किया है, उन्हें भी अयोग्य घोषित किया जाए। प्रशासन का रुख गरीब ग्रामीणों के खिलाफ किसान सभा बैजनाथ के अध्यक्ष अक्षय जसरोटिया ने इस फैसले पर आपत्ति जताई है। उन्होंने कहा कि प्रशासन का यह रुख उन गरीब ग्रामीणों के खिलाफ है जो पीढ़ियों से इन जमीनों पर बसे हुए हैं। जसरोटिया के अनुसार, जिन लोगों ने वन अधिकार कानून 2006 के तहत अपने हक का दावा पेश किया है। इनके मामले अभी लंबित हैं, उन्हें अवैध कब्जाधारी नहीं कहा जा सकता। उन्होंने तर्क दिया कि कानूनन जब तक दावे का निपटारा नहीं होता, तब तक आवेदक को बेदखल नहीं किया जा सकता। इसलिए, उन्हें चुनाव लड़ने से रोकना उनके लोकतांत्रिक और कानूनी अधिकारों का सीधा उल्लंघन है। जनप्रतिनिधियों पर लटकी अयोग्यता की तलवार बड़ा ग्रां की पूर्व प्रधान पवना कुमारी ने भी इस स्थिति पर चिंता व्यक्त की है। उन्होंने कहा कि निर्वाचन आयोग के इस नए निर्देश से उन जमीनी कार्यकर्ताओं के लिए मुश्किलें खड़ी हो गई हैं जो समाज सेवा करना चाहते हैं।