जिन बेटियों के लिए कोई खड़ा नहीं हुआ, उन्हें समर्पित है आभा

कई बार हालात आपको कहां से कहां ले आते हैं कि सोचने तक का वक्त नहीं मिलता… बेटी स्कूल से आकर मां को बताती है कि किताब न होने से मास्टरजी ने उसे बहुत डांटा। इसपर मां कहती है कि तुम्हारे बाबा आने वाले हैं जाआे खाना बनाआे। हालांकि, मां बच्ची की बात सुन सकती थी, उसके सपने को महसूस कर सकती थी। बाबा आते हैं तो बेटी की शादी के बारे में बात होती है। मां कहती है कि अभी तो आभा केवल 15 बरस की है, लेकिन पति की मर्ज़ी के आगे वह चुप हो जाती है। बाबा बेटी को बताते हैं कि उसका रिश्ता पक्का कर दिया गया है। मगर बिटिया के पढ़ने का सपना टूट गया। कितनी ही ऐसी बेटियां हैं, जिनका सपना अधूरा रह जाता है। यही सब अनंत कौर ने अपनी लिखी और निर्देशित शॉर्ट फिल्म ‘आभा’ के जरिए दिखाया है। यह फिल्म 24 एफपीएस इंटरनेशनल एनिमेशन अवॉर्ड्स में शॉर्टलिस्ट हुई है। अनंत पंजाबी फिल्मों में भी बतौर वीएफएक्स आर्टिस्ट काम कर रही हैं। एसोसिएट डायरेक्टर रवनीत सिंह अंश हैं। 10 मिनट की इस फिल्म में गौरी बनमोरिया, गगन, जतिंदर मान और मोनिका ने अभिनय किया है। प्रोडक्शन मैनेजर मुकुंद अरोड़ा, सिनेमैटोग्राफर शुभम रहे। फिल्म बनाने का ख्याल कैसे आया। अब 18 साल से पहले शादियों पर भी रोक है, तो 15 साल की उम्र दिखाने की खास वजह? अनंत ने बताया, “मैंने सोशल मीडिया पर एक वीडियो देखी, जिसमें एक तरफ स्कूल का और दूसरी ओर शादी का सामान रखा था। उसे देखते ही मैं पांच साल पीछे चली गई। मुझे हमारे घर पर काम करने वाली दीदी की याद आ गई। वह मुझसे सिर्फ एक साल बड़ी थीं। वह मेरे स्कूल से वापस लौटने का इंतज़ार करती थीं, ताकि मैं उन्हें पढ़ा सकूं। उन्हें आगे पढ़कर कुछ बनना था। एक दिन वह घर पर नहीं मिलीं, तो मम्मी ने बताया कि वह गांव चली गई हैं- उनकी शादी है। मैं हैरान थी कि इतनी कम उम्र में शादी कैसे हो सकती है… वहीं से ‘आभा’ की कहानी ने जन्म लिया। माना आज लड़कियां बहुत आगे बढ़ रही हैं, मगर जो आगे नहीं बढ़ पाईं, हमें उनकी बात भी करनी चाहिए। इस कहानी के जरिए मैंने उन्हीं को दिखाया है।” कहानी का अंत आत्महत्या ही क्यों चुना? अनंत ने बताया- इसमें नायिका को ड्रॉइंग का शौक होता है, जो कभी सीधे तौर पर नहीं कहा गया, उसे प्रतीकों के जरिए दिखाया गया है। भाई-बहन की विदाई के समय उसे ड्रॉइंग शीट, पेंसिल, शार्पनर और रंग दिए जाते हैं। अंत में, जब वह हिम्मत हार जाती है, तो उसी शार्पनर के ब्लेड से आत्महत्या कर लेती है। उसके हाथ से बहा खून फर्श पर एक पेड़ की तरह फैल जाता है। पास में एक पिंजरा रखा होता है, जहां आकर उसका पति खड़ा हो जाता है… इससे समझा जा सकता है कि वह किस हद तक कैद थी। मैंने यह अंत इसलिए दिखाया, ताकि हम आगे चलकर किसी और आभा को इस तरह का कदम उठाने पर मजबूर न करें।” वीएफएक्स की ज़रूरत सिनेमा को हमेशा से है वीएफएक्स की ज़रूरत तो हमेशा ही सिनेमा में बनी रहेगी। इसके आने से अब इसमें तकनीक को ज्यादा इस्तेमाल करके बेहतर कर सकते हैं। मैं 10वीं क्लास में थी जब वीएफएक्स सीखी। इसने मुझे आगे बढ़ने में काफी मदद की। यहां तक की पंजाबी फिल्में- छल्ला मुड़ के नी आया और मोड़ में भी मैंने बतौर वीएफएक्स आर्टिस्ट काम किया। मेरी बनाई फिल्म क्षीतिज- द लीप अॉफ फेथ को 24 एफपीएस इंटरनेशनल एनिमेशन अवॉर्ड मिल चुका है।

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